जीवन अनमोल है, आओ- इसकी वसूली पूर्णतया जी कर करें

Life is Precious, Let’s Live it to The Fullest :-

जीवन सदैव अपेक्षाओं से भरा है । प्रत्येक रिश्ता चाहे वह माता-पिता का हो, पति पत्नी या बच्चों का हो ,इसी चक्कर में जीवन उलझा रहता है। समस्त दुखों का जाल भी इसी चक्कर के इर्द गिर्द होता है। यह ऐसा चक्रव्यूह है जो हमारे मन, मस्तिष्क और शरीर को चारों ओर से घेर लेता है। व्यक्ति जानते हुए भी इसे नहीं तोड़ पाता और अपने जीवन का समावेश इन्हीं अपेक्षाओं में समाहित करता जाता है। यह एक ऐसी सम्मोहित अवस्था होती है कि यदि इसका मार्ग भी हम जानते हैं तो भी उससे निकलने का मन नहीं होता। धीरे धीरे अपेक्षाएं समस्त जीवन को विकृत करने लगती हैं जिससे व्यक्ति का अपना अस्तित्व खोने लगता है । इस चक्रव्यूह का अपने मन से विश्लेषण व मंथन करने का मन बना सोचा थोड़ा कुछ ठहर कर अपने आज का निरीक्षण किया जाए।

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का प्रवाह उसके वातावरण के आधार पर ही होता है जिसमें वह जन्म लेता है तथा पलता बढ़ता हुआ सीखता है। इसी वातावरण की विभिन्नता के कारण प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग जीवन शैली रखता है। माना यह भी जाता है कि उसका आज का जीवन उसके पूर्व जन्म कृत कर्मों के फल का परिणाम है परंतु इस दार्शनिक विषय में ना पड़कर हम  सांसारिक व व्यावहारिक विषय को आधार मानकर ही अपनी बात करेंगे।

इस संसार में चाहे पुरुष हो या स्त्री प्रत्येक का जीवन अपने अपने वातावरण के आधार पर ही चल रहा है । प्रत्येक का अपना जीवन स्वतंत्र है, उसका हर सुख-दुख व्यक्तिगत है ,फिर भी प्रत्येक अपने व्यक्तिगत सुख दुख का आधार दूसरे को ही मानता है। पुरुष है तो उसके सुख-दुख का आधार पैसा, व्यापार, पत्नी ,बच्चे आदि हैं और यदि स्त्री है तो उसके सारे सुख दुख का आधार उसका पति, बच्चे , उसके गहने, कपड़े आदि हैं। हमारे जीवन में हमारे सुख-दुख का  मापदंड यही रहता है यही कारण है कि हम बहिर्मुखी  होते जाते हैं और जीवन निरंतर चलता रहता है। सुख-दुख की वास्तविकता से परे हम समय की धारा में बहते चले जाते हैं । जब तक शरीर की शक्ति बनी रहती है तब तक अपने अंदर अनेक प्रकार की  गांठें कुंठाएं बनती रहती हैं और जब शारीरिक शक्ति क्षीण होने लगती है तो यह कुंठाएं हमारे अपने अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करने लगती हैं।

प्रत्येक व्यक्ति स्व का अर्थ भूलता जा रहा है या यूं कहें कि अपने अंदर की आवाज वह सुन नहीं पा रहा है । वह ना तो सांसारिकता को समझ पा रहा है ,ना ही आध्यात्मिकता को। यही कारण है कि हर कोई एक अज्ञात की तलाश कर रहा है। अज्ञात इसलिए क्योंकि ना तो उसे अपनी भूख का पता है और ना चाह का , वह जीता है रोजमर्रा के एक ही ढर्रे पर और निरंतर चलता ही रहता है। बिना उद्देश्य और बिना समझ की तलाश उसे और भी कुंठित करती जाती है, इसके परिणाम स्वरूप जीवन  निरुत्साहित सा होने लगता है । समय से पहले चेहरे की कांति नष्ट होने लगती है तथा बनावटी आवरण ओढ़े उससे अपने आप को छिपाने  का भरसक प्रयत्न करता है। उसका यह द्वंद्व उसके दैनिक व्यवहार में जहां-तहां दिखने लगता है कभी क्रोध के रूप में ,कभी झल्लाहट,  ईर्ष्या- द्वेष के रूप में।

इसके पश्चात हम इसे ही अपने जीवन को जीने का ढंग मान लेते हैं । वास्तव में यह जीवन और मरण के बीच की तय यात्रा बन के रह जाती है ।अर्थ यह नहीं कि हमें रिश्तो को दरकिनार कर देना चाहिए यह सच है कि रिश्तों पर ही हमारी खुशियां निर्भर करती हैं परंतु हर रिश्ते किसी व्यक्तिगत अस्तित्व के खिलने बढ़ने का आधार हो सकते हैं यहीं से समस्या खड़ी होती है कि यदि एक घर में चार पांच सदस्य हैं तो सामजस्य कैसे बनें ?

व्यक्तित्व एक है, विचार भी व्यक्तिगत है , पांच व्यक्ति पांच विचार— कौन सही , कौन गलत ? यह भयंकर समस्या ! फिर कैसे सामजस्य हो ? यदि ना हो तो कैसे एक दूसरे के लिए सहायक बने ? पुरुष कहे मैं पुरुष, मैं पति, मैं पिता ,बेटा आदि  स्त्री कहे मैं मां, मैं पत्नी ,बहन, बेटी ! जब व्यवहारिक अधिकारों की बात आती है तो “मैं” का भाव ! कर्तव्य की भावना  पर “मैं” का  अस्तित्व वास्तविक “मैं” से अधिक बड़ा होने लगता है ।तब सब गड़बड़ होने लगता है, पुरुष स्त्री विभिन्न स्वरूपों में महान बन जाता है । हालत यह कि छोटा कोई नहीं होता ,अब कौन किसका सहायक और किस का वास्तविक स्वरूप सब उलझ जाता है । यह एक अनसुलझी पहेली है जो किसी के लिए भी पूर्ण रूप से सुलझाना  असंभव है ।

जीवन एक चक्र है । प्रत्येक स्त्री पुरुष पहले बच्चे होते हैं ,फिर मां-बाप बनते हैं और फिर दादा-दादी , नाना-नानी, हर एक भूमिका उसका नया जीवन होती है । विशेष यह कि प्रत्येक भूमिका केवल एक बार ही होती है ,इसकी पुनरावृत्ति नहीं होती । परिणाम स्वरूप वह उम्र भर सीखता जाता है और चलता जाता है । प्रत्येक भूमिका उसके वातावरण पर प्रभाव डालते जाती है। हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि जीवन जटिल है इसकी व्यवस्था व स्व अस्तित्व बनाए रखना उससे भी जटिल है ।

पत्नी अपनी इच्छा अनुसार कार्य करना चाहे पति के लिए समस्या, पति पत्नी के अनुसार ना चले पत्नी दुखी, बच्चे माता पिता की अपेक्षाओं पर खरे ना उतरे माता पिता दुखी, माता पिता बच्चों की इच्छा के अनुसार ना चले बच्चों के लिए  कठिनाई । सब अलग-अलग सबकी इच्छाएं अलग-अलग तो कैसे सबका सामजस्य  हो? यहीं से प्रारंभ होता है अहम , एक दूसरे पर दबाव , प्रतिस्पर्धा कि मैं ठीक ,वह गलत, मैं मालिक , सब मेरे अधीन, यहीं से वातावरण बनता है।

जीवन में भाव का बहुत महत्व है।  अपने होने का भाव बड़े कमाल का है।  इस भाव का अनुभव करने का आधार भी दूसरा ही होता है जैसे पति के प्रति पत्नी की भावना पति के होने का भाव तथा पत्नी के प्रति पति की भावना पत्नी के होने का भाव । यहां पर यदि सही सामंजस्य हो पाता है तो पारिवारिक स्तर पर एक वातावरण बनता है जो कि  जीवन को मूल्यवान बना देता है । यह पूर्ण समर्पण है . यहां से जो उत्पन्न होगा वह विलक्षण होगा परंतु यह मुश्किल से ही संभव हो पाता है। इसी तरह माता पिता बच्चों के संबंध में भी हो सकता है परंतु आजकल यह भी उतना ही मुश्किल है।

परिवार हमारे जीवन का महत्वपूर्ण भाग है । व्यक्ति के व्यक्तित्व में संस्कार इस वातावरण से ही बनते हैं । इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि अच्छे संस्कार आचार विचार आदि बच्चों में हो तो  अपेक्षाएं ना रहती हों। मेरे अनुभव में यह आया है कि यदि घर में स्त्री पत्नी के रूप में सम्माननीय व संतुष्ट है तू यहां पर बच्चों का पालन बहुत उचित ढंग से होता है । वही मां स्वस्थ मानसिकता वाले बच्चों को जन्म देती है । दूसरी ओर यहां पुरुष का भी सम्मान व  स्वस्थ मानसिकता का होना आवश्यक है , परंतु विडंबना यह है की समस्त चीजें एक जगह मिलना असंभव है अतः कहा जा सकता है कि जीवन का मार्ग बहुत टेढ़ा है ।

जीवन की सार्थकता जीवन के संतुलन में है । हमारे जीवन का अधिकतर भाग अपनी पारिवारिक सीमा के आसपास ही बीतता है । जीवन से समस्त  सुख दुख भी इसी परिधि के अंतर्गत आते हैं । संसार की उच्चतम भौतिक या आध्यात्मिक सभी अनुभूतियों का मूल आधार हमारे जीवन का यही भाग है । अतः निष्कर्ष यह है की जीवन का मूल्य जीवन को पूर्ण रूप से ही जी कर प्राप्त किया जा सकता है। जीवन अमोल है , आओ- इसकी वसूली  पूर्णतया जी कर करें ।

Dr. Meena Sharma

Astrology Expert | Astro Teacher | Life Coach | Chandigarh, India

This Post Has 3 Comments

  1. N.C BEDI

    Thanks for enlighenment on the basics of life ,well said and well explained truth of living. But what are the solutions to cater all these complications?How to simplify? what may be the real practical adoptable applications of those solutions?
    if posiible please enlighten.
    thanks and warm regards
    n.c bedi

  2. trilok jayara

    Very nicely written. Keep enlighten us through our beautiful journey of life ….🙏

  3. Pragya

    Well explained n well said.

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